Thursday, September 18, 2008

जिंदगी


वो पीपल के पत्ते, वो चाँद रात का,

वो बात यार की, वो साथ प्यार का



वो "चप्पलों" के तकिये, वो बिस्तर सड़क का,

वो रोशनी की बूँदें, वो आँचल फलक का



वो रंग दोस्ती के,वो ख्वाबों की बस्ती,

महल वो जिंदगी का, बस याद आते हैं





वो चलना बस अकेले, वो ख़ुद से करना बातें,

"शैतान" से झगड़ना, "खुदा" से मुलाकातें



कुछ टूटते से सपने, कुछ पूरे होते वादे,

कुछ नवेले से रिश्ते, कुछ झूठे से वो नाते



वो रोज "ख़ुद" से मिलना, वो शाम जिंदगी की,

"सूरज" का रोज उगना, बस याद आते हैं



©copyright protected 1985-............



This poem enjoys my four years “lived” in my college and this poem is only “for and because of” my friends. I wanted to write more and more lines but could not find enough words to summarize my life in “few” words, so this is just a “bit” of my Life. May be you will like it.




5 comments:

Anonymous said...

वो चलना बस अकेले, वो ख़ुद से करना बातें,
"शैतान" से झगड़ना, "खुदा" से मुलाकातें


ख़ूबसूरत खयाल
वाह!

Tarun Goel said...

@rohitler
Thnx for the comments.

DataDab said...

Never knew this "shaayar" side of you...:-)its so pleasing to know folks havent lost interest in it..can say u've found a new reader in me for ur blogs..carry on the good work..keep it updated wid new stuffs..

Vinay said...

बहुत खूब साहब! क्या बयान किया है ज़िन्दगी के लम्हों को! वाह!

Dadda ki Khari Khari said...

ok.......so u r a poet too .....its really good ....keep writing
ajit